Friday , 25 May 2018
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23 मार्च का दिन याद दिलाता है देश के वीर सपूतों कीः श्वेता चंदन


अगर हम अपने देश का इतिहास उठाकर देखे तो हमारा इतिहास वीरों की गाथाओं से भरा पड़ा है। इन्हीं वीरों में से थे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू जिनका जन्म ही मातृभूमि की सेवा के लिए ही हुआ था। अपनी क्रांतिकारी कामों से अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे और अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। आज के ही दिन सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरू ने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये थे। इस दिन को पूरा भारत देश शहीद दिवस के रुप में मनाता है।

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23 मार्च का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस दिन देश के सच्चा और निडर सपूत भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरू को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। क्रांतिकारी भगत सिंह की शहादत दिवस को देश शहीद दिवस के रूप में मनाता है। अंग्रेजों ने भगत सिंह को फांसी पर लटका तो दिया लेकिन आजादी की अलख करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों में भारत का ये सपूत जगा गए।

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भगतसिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून-खराबा न हो और अंग्रेजों तक उनकी आवाज पहुंचे। निर्धारित योजना के अनुसार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंका। लेकिन वो बम फेंकने की घटना से तो बरी हो गये थे लेकिन लाहौर षड्यंत्र के मुकदमे से बरी नहीं हो सके।

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ये एक संयोग ही है कि ये तीनों अमर शहीद 1 साल (1907-1908) के भीतर ही पैदा हुए और 23 मार्च, 1931 को एक दिन एक साथ ही शहीद हो गए। इनकी इस शहादत को भारत का हर एक बच्चा आज तक भी नहीं भूल पाया है और आने वाली कई सदियों तक नहीं भूल सकेगा….भारत माता के इन अनमोल रत्नों की शहादत को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। ये दिवस न केवल देश के प्रति सम्मान और हिंदुस्तानी होने वा गौरव का अनुभव कराता है, बल्कि वीर सपूतों के बलिदान को भीगे मन से श्रृद्धांजलि देता है।

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श्वेता चंदन, पत्रकार

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