Sunday , 25 February 2018
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क्यों एक औरत ही तीन तलाक़ और हलाला जैसी कुरीतियों का शिकार होती है ?- तृप्ति शर्मा


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किसी देश का संविधान उस देश की नींव होता है लेकिन देश में चल रहे तीन तलाक और हलाला पर हो रहे बहस ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या शरीयत संविधान से ऊपर हो गया है या फिर हर मुद्दे पर यह कह देना की इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है, खुद में ही नया फैशन बन गया है। जी हां, आज मैं आप सभी को कुछ ऐसे ही मुद्दों से रूबरू कराना चाहती हूं। एक तरफ तो हम धर्म, आस्था से जुड़े गीता, कुरान का सहारा लेकर लोगों को समय-समय पर मार्गदर्शित करते है, वहीं दूसरी ओर हम समाज की पुरानी और दकियानूसी विचारों को अपने फायदे के लिए अलग-अलग जामा (कपड़ा) पहनाकर उसे धर्म की आड़ में छुपा देते हैं। अब तो नजर अहमद ने भी कह दिया की राजनेता हमारे शरीयत पर हमला करना चाह रहे हैं।

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मेरा प्रश्न बस इतना है की क्या वाकई हुकूमत इन मामलों पर लोगों को सिर्फ कष्ट दे रहा है या वास्तविकता कुछ और ही है या फिर हम ये मान ले की महिलाओं के पाले में सिर्फ दुःख और दर्द ही सहना लिखा है? अगर ऐसा नहीं है तो क्यों हर बार एक औरत ही तीन तलाक़ और हलाला जैसी कुरीतियों का शिकार होती है? पुरुष क्यों नहीं ? जब निकाह के वक़्त महिलाओं से उनकी रजामंदी ली जाती तो फिर तलाक़ के वक़्त क्यों नहीं? क्यों वो इतनी महत्वहीन हो जाती हैं की उसका शौहर कभी उसे फ़ोन पर तो कभी गुस्से में आकर उसे तीन तलाक़ का फरमान सुना देता है।

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क्या इस्लाम में ऐसी किसी प्रक्रिया का उल्लेख है भी? क्या कुरान या हदीस में पुराने साढ़े चौदह सौ बरस से चले आ रहे यह नियम-कानून आपकी नजर में ठीक है? क्या सायरा बानो जैसी पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं मिलना चाहिए? आज भी तीन तलाक के मामलें हमारे देशभर के कोर्ट में भरे पड़े हैं। जिन पर सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं)

तृप्ति शर्मा, पत्रकार
तृप्ति शर्मा, पत्रकार

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