Sunday , 25 February 2018
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कुछ कर गुजरने के लिए उम्र नहीं, साहस और क्षमता चाहिए।


महिलाओं को लेकर हमेशा से समाज में एक भ्रांति व्याप्त रही है की वो पुरुषों से कमजोर है, मगर एक बार फिर एक महिला ने इस बात को गलत साबित कर दिया है और पुरुष प्रधान समाज के मुंह पर जोर का तमाचा मारा है। अगर मन में कुछ कर गुजरने का विश्वास हो, हुजूम में साहस और क्षमता हो तो किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है।

16 साल की अदनी सी उम्र में जब हम और आप समाज की चिंताओं से दूर अपने और अपने परिवारजनों के बीच मौज-मस्ती में लगे होंगे तभी एक बच्ची जिसकी उम्र मात्र 16 वर्ष ही थी, वो इस उथले-पुथले समाज के अनसुलझे पहलुओं के बीच समाज के शोषित और लाचार वर्ग के लोगों के उत्थान का सपना पूरा करने में लगी हुई थी।

पुराने लखनऊ की निवासी उस महिला शक्ति का नाम है रुखसाना नकवी… जो अपने नाम से नहीं अपने काम और हौसलों से जानी जाती हैं।

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वर्तमान में अब उनकी उम्र करीब 36 वर्ष हो चुकी है मगर जोश और जुनून पहले की तरह आज भी देखते ही बनता है, यह बताते हुए उनकी आँखें नम हो जाती है कि जब उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा पास की तो बहुत सारे ऐसे बच्चों को देखा जो पढ़ना तो चाहते है मगर हालात और गरीबी के आगे लाचार थे। मासूमों ने स्कूलों का मुँह तक नहीं देखा तभी उन्होंने दृढ़ता के साथ उन बच्चों को फ्री में पढ़ाना शुरू कर दिया।

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4 भाई और 3 बहनों में 5वें नंबर पर आने वाली रुखसाना नकवी, जिनके पिता फौज में सूबेदार भी थे। पिता से मिले जेब खर्च के पैसों को वो समाज के शोषित वर्ग के उत्थान में ही लगा देती थी। वो बताती हैं कि पहले वो शादी के नाम से सहम जाती थी, कहीं ससुराल की जिम्मेदारियों के बीच इन मजलूमों से रिश्ता ना टूट जाये मगर वो अपने परिवार को धन्यवाद देती है की परिवार मेरे और समाज सेवा के बीच कभी नहीं आया। शादी के बाद भी चाहे गर्मी हो, सर्दी हो या फिर बरसात। वो बच्चों को 4 किमी पैदल चल कर ही पढ़ाने जाती थी।

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सालों साल ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा। इस बीच कई सामाजिक मुद्दों को भी उनके द्वारा उठाया गया और आवश्यकता पड़ने पर अनशन भी किया गया। अब खुद भी उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को 8वीं तक के बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप दी है। माँ-बेटी पूरी लगन से आज भी बच्चों को फ्री में पढ़ा रहीं हैं। आर्थिक तौर पर समाज को सहारा देने के लिए उन्होंने एलआईसी की एजेंट के तौर पर भी कार्य किया है। साथ ही महिलाओं के बीच सिलाई-कढ़ाई के काम से मिले धन को समाज के कल्याण में आज भी खर्च कर रही हैं।

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युवा पत्रकार.com से बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके समुदाय की निशानी जिसे वो आलम बताती है, इमामबाड़े के अंदर स्थापित कर उनके द्वारा इतिहास में एक और पन्ने की नींव रखी गयी, जिसके चलते प्रशासन ने उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की है। वो कहती हैं कि उन्हें न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। प्रोत्साहन देते हुए लोगों द्वारा उनसे अपील भी की गई है कि वो सक्रिय राजनीति में उतरें। लोगों की अपील को स्वीकार करते हुए रुखसाना नकवी लखनऊ के ही बालागंज, वार्ड नं 18 से पार्षद का चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। वो उम्मीद करती हैं कि समाज के हर वर्ग का उनको सहयोग प्राप्त होगा।

 

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