Friday , 25 May 2018
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राष्ट्रीय दर्दः समीर निगम


कुछ दिन पहले सभी की जुबान पर एक ही प्रश्न था, आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, फिल्मकारों ने इस राष्ट्रीय प्रश्न के उत्तर के लिए जनता से करोड़ों रुपए वसूले।

जिस समय आप और हम इस राष्ट्रीय जिज्ञासा की शांति के लिए फिल्म पर रुपए लुटाने में तल्लीन थे, तभी देश का कोई अन्नदाता 2 जून की रोटी के लिए फाँसी के फंदे पर झूल रहा था। मेरी पीड़ा किसी फिल्म या फिल्मकार से नहीं, बल्कि मैं दुख के सागर में गोते सिर्फ इसलिए लगा रहा हूँ, क्योंकि पूरे देश का पेट भरने वाले उस अन्नदाता की अंतिम चित्कार को भी मैं सुन ना सका।

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यूँ तो देश की राजनीति और नौकरशाही ने विकास की गंगा को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बहा रखा है मगर ये गंगा सिर्फ सरकारी फाइलों में ही कैद है। शुक्र है कि फाइलें बेजुबान होती हैं बोल नहीं सकतीं, वरना इस विकास की गंगा के झूठ को तार-तार होना पड़ता।

आज के दौर में अन्नदाता सिर्फ जरूरत का ढोल बन कर रह गया है जिसे त्योहार (चुनाव) आने पर सभी राजनीतिक पार्टियाँ जी भर के बजाती हैं और फिर अगले चुनाव का इंतजार होता है।

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किसानों की मौत का जिम्मेदार जितना कुदरत है उससे भी कहीं ज्यादा जिम्मेदार इस देश का काबिल  सिस्टम है, जिसकी काबलियत का खामियाजा आज अन्नदाता को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।

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समीर निगम
पत्रकार, लखनऊ

नैतिक पतन की पराकाष्ठा को छू चुकी इन सरकारों से अब किसानों के उद्धार की बात बेईमानी है, ऐसा कह कर हम और आप बच नहीं सकते। इसलिए अब समाज को खुद ही जाग्रत होना होगा और आगे बढ़कर किसानों की बाँह थामनी होगी।

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