Sunday , 25 February 2018
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एक और पत्रकार की हत्या… शांतनु भौमिक की मौत पर इतना सन्नाटा क्यों? जवाब चाहिए।


हेडलाइन पढ़कर शायद आप सोच रहे होंगे कि ये खबर किसी के पक्ष में लिखी जा रही है। लेकिन नहीं, पत्रकारों में क्रोध उतना ही है जितना पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर था। लेकिन सवाल ये है कि पत्रकारों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है। क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंम्भ पर हमला कर लोकतंत्र की हत्या करना सही है? कौन हैं वो लोग जिनकी शह पर पत्रकारों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा जा रहा है।

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आज एक और युवा पत्रकार हमारे बीच नहीं रहा। उसकी भी इन लोकतंत्र के रखवालों की नाक के नीचे हत्या कर दी गई। हम बात कर रहे हैं त्रिपुरा के शांतनु भौमिक की। शांतनु त्रिपुरा के एक स्थानीय न्यूज़ चैनल ‘दिनरात’ में रिपोर्टर था। बुधवार रात को पहले तो उसका उपहरण किया गया फिर चाकुओं से लहूलुहान कर दिया गया। शांतनु पश्चिमी त्रिपुरा जिले में इंडिजीनस पीपुल्स फ्रंट आफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के आंदोलन को कवर कर रहे थे। तभी उन पर पीछे से हमला किया गया और उनका अपहरण कर लिया गया।

पुलिस की माने तो जब भौमिक का पता लगा तब उनके शरीर पर चाकू से हमले के कई निशान थे। उन्हें तत्काल अगरतला मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया जहां डक्टरों ने उन्हें मृत लाया घोषित कर दिया। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बादल चौधरी ने उनकी हत्या की निंदा की है। या यूं कहे कि अपनी नाकामी छुपाने के लिए सहानिभूति दी है। राज्य के सूचना मंत्री भानूलाल साहा अस्पताल भी गए, शायद वो भी सरकार पर दाग नहीं लगने देना चाहते थे, लेकिन शांतनु को बचाया नहीं जा सका।

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पुलिस के अनुसार, कथित तौर पर आदिवासी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शांतनु भौमिक की हत्या की। पुलिस अधीक्षक नागेंद्र देव वर्मा ने  बताया कि त्रिपुरा राजेर उपजाति गण मुक्ति परिषद के समर्थक जीएमपी की एक रैली में शामिल होने के लिए अगरतला जा रहे थे और खोवई में बस स्टैंड पर इकट्ठा हुए थे। वहां इंडीजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के कार्यकर्ताओं का एक समूह भी मौजूद था, जिन्हें रैली के बारे में पता चला और वे कथित रूप से भड़क गए।

उन्होंने बताया कि तब अन्य लोगों ने बीच-बचाव किया और बात नहीं बढ़ी। लेकिन जब बस छानखोला गांव से कुछ दूरी पर थी तब जंगल में छिपे आईपीएफटी के कुछ कार्यकर्ताओं ने वाहन पर हमला किया। उन्होंने जीएमपी कार्यकर्ताओं पर लोहे की छड़ों और डंडों से हमला किया। घटना के बाद मंगलवार से ही मंडाई के साथ-साथ पश्चिमी त्रिपुरा के 10 से अधिक जगहों पर धारा 144 लागू कर दी गई है।

मंडाई में भीड़ को इकट्ठा होने से रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज का सहारा लिया। इसी घटना के दौरान आईपीएफटी के कार्यकर्ताओं ने 28 साल के शांतनु भौमिक को मौत के घाट उतार दिया। यानि की गुस्सा किसी और का और निकाला गया निर्दोष पत्रकार पर…

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इसी बीच देश के ऊंचे पदों पर बैठे पत्रकारों में भी तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई है। दो धड़ों में बंटे पत्रकारों में सवाल उठ रहे है कि अब क्यों प्रेंस क्लब में पत्रकारों ने प्रदर्शन नहीं किया। बताया जा रहा है कि ‘आउटरेज इंडस्ट्री’ में सन्नाटा है क्योंकि ये उनके गैंग का नहीं था? लेकिन ये कोई नहीं सोच रहा कि शांतनु भी एक पत्रकार था, आपको वाद-विवाद से पहले उपने पेशे और पत्रकारिता के सिद्धातों के बारे में सोचना चाहिए। आप लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का संचालन करते है।

लेकिन कही ना कही ये सवाल लाजमी है कि शांतनु की मौत पर इतना सन्नाटा क्यों है। पत्रकारिता जगत में उतना रोष क्यों नहीं, जितना गौरी लंकेश की हत्या पर था। या फिर गौरी लंकेश हत्याकांड में एक प्रोपोगेंडा सेट किया गया था, जिसमें देश विरोधी ताकतें और विपक्षी दलों के लोग कूद कर पत्रकारों के पीछे से दम भर रहे थे। हालांकि गौरी लंकेश कांड में सत्ता पक्ष के भी लोगों ने कम वकालत नहीं की थी। या यूं कहे कि आज शांतनु की मौत पर सत्ता पक्ष को वो सवाल पूछने का अवसर मिला है, जो विपक्ष को गौरी लंकेश की हत्या पर पूछने को मिला था। फिलहाल इस दौर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपनी एकता बनाए रखने की जरुरत है, उसे किसी भी राजनीतिक पक्ष को संजीवनी देने की जरुरत नहीं है।

पत्रकारों की हत्या उन सरकारों और कानून के रखवालों पर कलंक है जो राजनीतिक फायदे के लिए पत्रकारों की हत्या को मुद्दा बनाते है। शांतनु की हत्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर करारी चोट है, जो पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल उठाती है। यह घटना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। शांतनु हम तुम्हारे इंसाफ के लिए लड़ते रहेंगे।

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